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- रोज़ कितना चलाना है? 15 किलोमीटर रोज़ चलाने वाले और 50 किलोमीटर चलाने वाले के लिए सही गाड़ी अलग होती है। खासकर इलेक्ट्रिक लेने का हिसाब पूरी तरह इसी पर टिका है।
- गाड़ी कहाँ खड़ी होगी? अगर आप इलेक्ट्रिक सोच रहे हैं, तो सबसे पहले ये देखिए कि जहाँ गाड़ी खड़ी होगी वहाँ बिजली का पॉइंट है या नहीं। नहीं है तो इलेक्ट्रिक रोज़ की परेशानी बन जाएगी।
- सर्विस सेंटर कितनी दूर है? गाड़ी अच्छी हो पर सर्विस 50 किलोमीटर दूर हो, तो हर बार दिक्कत होगी। खरीदने से पहले नज़दीकी सर्विस सेंटर का पता ज़रूर पूछिए।
इलेक्ट्रिक स्कूटी पर मिलने वाली सरकारी छूट 31 जुलाई 2026 को बंद हो रही है
PM E-DRIVE योजना के तहत अभी इलेक्ट्रिक टू-व्हीलर पर ₹2,500 प्रति kWh की छूट मिलती है, ज़्यादा से ज़्यादा ₹5,000 तक। ये छूट शोरूम में ही कीमत से कट जाती है — कोई फॉर्म नहीं भरना पड़ता।
सरकार ने e-2W के लिए आखिरी तारीख 31 जुलाई 2026 रखी है। ये योजना फंड-लिमिटेड है — यानी तय पैसा पहले खत्म हो गया तो तारीख से पहले भी बंद हो सकती है। आगे बढ़ाने पर विचार चल रहा है, पर अभी कोई पक्का ऐलान नहीं हुआ।
मतलब साफ है — अगर इलेक्ट्रिक लेने का मन है, तो रजिस्ट्रेशन की तारीख मायने रखती है, बुकिंग की नहीं। डीलर से लिखित में पूछ लीजिए कि गाड़ी कब रजिस्टर होगी।
गाड़ी खरीदने की पूरी गाइड
गाड़ी लेने से पहले जो बातें कोई नहीं बताता
भारत में हर साल लगभग दो करोड़ लोग नई बाइक या स्कूटी खरीदते हैं। इनमें से ज़्यादातर लोग सिर्फ दो चीज़ें देखकर फैसला कर लेते हैं — गाड़ी दिखने में कैसी है, और शोरूम वाले ने कीमत क्या बताई। और यहीं सबसे बड़ी गलती हो जाती है।
क्योंकि शोरूम में जो कीमत लिखी होती है, आप असल में उतने में गाड़ी घर नहीं ले जा पाते। और जो EMI आपको "बस इतनी सी" लगती है, उस पर पूरे लोन में कितना ब्याज जाएगा — ये हिसाब कोई सामने से नहीं बताता। इस पेज पर हमने वही सब लिखा है जो एक ठीक-ठाक फैसला लेने के लिए ज़रूरी है: ऑन-रोड कीमत का असली हिसाब, लोन और EMI का गणित, इंश्योरेंस के नियम, और इलेक्ट्रिक बनाम पेट्रोल का सच्चा खर्च।
ऊपर दिए गए क्विज़ से आपको एक शुरुआती दिशा मिल जाएगी कि आपकी पसंद के हिसाब से कौन सी गाड़ियाँ देखने लायक हैं। उसके बाद नीचे की जानकारी पढ़िए — यही आपका पैसा बचाएगी।
सेक्शन 1
ऑन-रोड कीमत — शोरूम वाली कीमत सिर्फ शुरुआत है
शोरूम में जो रेट बोर्ड पर लगा होता है उसे एक्स-शोरूम कीमत कहते हैं। ये सिर्फ गाड़ी की कीमत है। इसके ऊपर तीन चीज़ें और जुड़ती हैं, और तब जाकर बनती है ऑन-रोड कीमत — यानी वो पैसा जो आपकी जेब से सच में जाएगा।
इसमें क्या-क्या जुड़ता है
- रोड टैक्स — ये राज्य सरकार लेती है और हर राज्य में अलग है। आमतौर पर गाड़ी की कीमत का 6 से 12 प्रतिशत तक बैठता है। यही सबसे बड़ा जुड़ने वाला खर्च होता है।
- रजिस्ट्रेशन और RTO चार्ज — नंबर प्लेट, स्मार्ट कार्ड RC और RTO की फीस।
- इंश्योरेंस — सितंबर 2018 के बाद से हर नई टू-व्हीलर के साथ 5 साल का थर्ड-पार्टी कवर देना कानूनन ज़रूरी है, इसलिए ये ऑन-रोड कीमत में पहले से जुड़ा होता है।
- हैंडलिंग / लॉजिस्टिक चार्ज — यही वो जगह है जहाँ शोरूम अपनी मर्ज़ी से पैसे जोड़ते हैं। इसका कोई सरकारी नियम नहीं है। इस पर मोल-भाव हो सकता है और होना चाहिए।
सेक्शन 2
लोन और EMI — कम किस्त का मतलब सस्ता सौदा नहीं होता
भारत में बिकने वाली ज़्यादातर टू-व्हीलर फाइनेंस पर जाती हैं। बैंक या फाइनेंस कंपनी आमतौर पर गाड़ी की कीमत का 70 से 90 प्रतिशत तक लोन दे देती है, बाकी डाउन पेमेंट आपको देना होता है। ब्याज दर आमतौर पर सालाना 10 से 16 प्रतिशत के बीच रहती है — ये आपके सिबिल स्कोर, आमदनी के सबूत और फाइनेंस कंपनी पर निर्भर करती है।
अब असली बात। शोरूम में आपसे यही पूछा जाएगा — "कितनी किस्त बनवानी है?" और अगर आपने कहा "कम से कम", तो वो लोन की अवधि बढ़ा देंगे। किस्त तो सच में कम हो जाएगी, लेकिन कुल ब्याज कहीं ज़्यादा भर जाएगा।
एक ही लोन, अलग-अलग अवधि — फर्क देखिए
मान लीजिए ₹80,000 की गाड़ी है, आपने ₹15,000 डाउन पेमेंट दिया, यानी ₹65,000 का लोन लिया, ब्याज दर 12% सालाना।
| अवधि | महीने की किस्त | कुल ब्याज |
|---|---|---|
| 12 महीने | ₹5,775 | ₹4,302 |
| 24 महीने | ₹3,060 | ₹8,435 |
| 36 महीने | ₹2,159 | ₹12,721 |
| 48 महीने | ₹1,712 | ₹17,162 |
हिसाब सिर्फ समझाने के लिए है। प्रोसेसिंग फीस और दूसरे चार्ज इसमें शामिल नहीं हैं।
ध्यान से देखिए। 24 महीने से 48 महीने करने पर किस्त ₹3,060 से घटकर ₹1,712 हो जाती है — देखने में बहुत राहत लगती है। लेकिन कुल ब्याज ₹8,435 से बढ़कर ₹17,162 हो जाता है। यानी लगभग ₹8,700 ज़्यादा — इतने में तो एक साल का पेट्रोल आ जाता।
सेक्शन 3
इंश्योरेंस — जो चीज़ आधे से ज़्यादा लोग गलत करते हैं
मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 146 के मुताबिक सड़क पर चलने वाली हर गाड़ी के पास कम से कम थर्ड-पार्टी इंश्योरेंस होना कानूनन ज़रूरी है। इसके बिना गाड़ी चलाने पर पहली बार ₹2,000 और दोबारा पकड़े जाने पर ₹4,000 का जुर्माना है, और तीन महीने तक की सज़ा का प्रावधान भी है।
फिर भी अंदाज़ा है कि देश की आधी से ज़्यादा टू-व्हीलर बिना वैध इंश्योरेंस के चल रही हैं। ज़्यादातर मामलों में वजह लापरवाही नहीं — बस ये है कि पॉलिसी कब खत्म हुई, पता ही नहीं चला। अब कई शहरों में ट्रैफिक पुलिस VAHAN डेटाबेस से सीधे ऑनलाइन जाँच कर लेती है, यानी बिना रोके भी चालान आ सकता है।
थर्ड-पार्टी की दर सबके लिए एक जैसी है
ये समझना ज़रूरी है — थर्ड-पार्टी की दर कंपनी नहीं, IRDAI और सड़क मंत्रालय तय करते हैं। इसलिए ये हर कंपनी में बिल्कुल एक जैसी होती है, इसमें मोल-भाव का सवाल ही नहीं। इंजन की क्षमता के हिसाब से दरें कुछ इस तरह हैं:
| इंजन क्षमता | सालाना थर्ड-पार्टी प्रीमियम |
|---|---|
| 75cc तक | ₹538 |
| 75cc – 150cc | ₹714 |
| 150cc – 350cc | ₹1,366 |
| 350cc से ऊपर | ₹2,804 |
| इलेक्ट्रिक (3 kW तक) | ₹457 |
| इलेक्ट्रिक (3–7 kW) | ₹607 |
ये अधिसूचित आधार दरें हैं और कई साल से लगभग स्थिर हैं। FY 2026-27 के लिए इनमें 10 से 25 प्रतिशत तक बढ़ोतरी पर चर्चा चल रही है, इसलिए रिन्यू कराते समय आज की दर ज़रूर पूछ लीजिए।
थर्ड-पार्टी और कॉम्प्रिहेंसिव में फर्क
थर्ड-पार्टी सिर्फ सामने वाले का नुकसान भरती है — अगर आपकी गाड़ी से किसी और को चोट लगी या उसका सामान टूटा। आपकी अपनी गाड़ी को कुछ हुआ, तो इससे एक रुपया नहीं मिलेगा। गाड़ी चोरी हो गई, तब भी नहीं।
कॉम्प्रिहेंसिव में थर्ड-पार्टी के साथ-साथ आपकी अपनी गाड़ी का नुकसान, चोरी, आग और बाढ़ जैसी चीज़ें भी कवर होती हैं। इसका प्रीमियम कंपनी तय करती है, इसलिए यहाँ तुलना करने से सच में पैसा बचता है — दो-तीन कंपनियों का ऑनलाइन कोटेशन देख लीजिए।
सेक्शन 4
इलेक्ट्रिक या पेट्रोल — पूरा हिसाब लगाकर देखिए
इलेक्ट्रिक स्कूटी शुरू में महँगी पड़ती है, लेकिन चलाने में सस्ती है। सवाल सिर्फ इतना है कि ये फर्क कितने समय में बराबर हो जाता है।
एक पेट्रोल स्कूटी लगभग 45 किलोमीटर प्रति लीटर देती है। पेट्रोल का भाव शहर के हिसाब से अलग है, मान लीजिए ₹105 प्रति लीटर — तो एक किलोमीटर चलाने का खर्च करीब ₹2.30 बैठता है। वहीं एक इलेक्ट्रिक स्कूटी घरेलू बिजली दर पर चार्ज करने पर लगभग 30 से 40 पैसे प्रति किलोमीटर में चल जाती है।
अगर आप महीने में 1,000 किलोमीटर चलाते हैं, तो हर महीने लगभग ₹1,900 से ₹2,000 की बचत होती है। साल भर में ये करीब ₹23,000 बैठता है। इलेक्ट्रिक और पेट्रोल की कीमत में अगर ₹25,000 से ₹35,000 का फर्क है, तो सवा साल से डेढ़ साल में वो फर्क वसूल हो जाता है।
लेकिन ये भी सोच लीजिए
- बैटरी सबसे बड़ा खर्च है। बैटरी की उम्र आमतौर पर 5 से 8 साल होती है और बदलवाने में अच्छा-खासा पैसा लगता है। PM E-DRIVE के तहत बिकने वाली गाड़ियों पर कम से कम 3 साल या 20,000 किलोमीटर की वारंटी ज़रूरी है — खरीदते समय वारंटी के कागज़ ज़रूर देख लीजिए।
- चार्जिंग की सुविधा। अगर आप ऐसी जगह रहते हैं जहाँ गाड़ी के पास बिजली का पॉइंट नहीं है, तो इलेक्ट्रिक रोज़ की परेशानी बन जाएगी। ये तय कीजिए, गाड़ी बाद में।
- लंबी दूरी। अगर आप अक्सर 80-100 किलोमीटर से ज़्यादा एक बार में चलते हैं, तो अभी पेट्रोल ज़्यादा आरामदायक रहेगा।
- सर्विस। छोटे शहरों और कस्बों में इलेक्ट्रिक का सर्विस सेंटर अभी कम है। खरीदने से पहले पता कर लीजिए कि आपके इलाके में सर्विस की सुविधा है या नहीं।
सेक्शन 5
माइलेज का सच
कंपनी जो माइलेज बताती है, वो एक तय टेस्ट में निकलता है — एक जैसी रफ्तार, अच्छी सड़क, एक ही सवारी। असली सड़क पर वो आँकड़ा शायद ही मिलता है। आम तौर पर असली माइलेज कंपनी के दावे से 10 से 20 प्रतिशत कम रहता है, और शहर की भीड़ में तो और भी कम।
सबसे ज़्यादा फर्क इन चीज़ों से पड़ता है: टायर में हवा कम होना, बार-बार तेज़ एक्सीलरेटर देना, समय पर सर्विस न कराना, और लंबे समय तक गाड़ी को खड़ी रखकर स्टार्ट करना। इनमें से ज़्यादातर आपके हाथ में हैं और इन्हें ठीक करने में एक रुपया खर्च नहीं होता।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
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अंतिम अपडेट — जुलाई 2026